समलैंगिकता अपराध है या नहीं, SC की संवैधानिक पीठ पर आज सुनवाई

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SC समलैंगिगता को अपराध के तहत लाने वाली धारा 377 पर सुनवाई करेगा. देश की सर्वोच्च अदालत ने सोमवार को इस मामले की सुनवाई में देरी से इनकार कर दिया था. केंद्र सरकार चाहती थी कि इस मामले की सुनवाई कम से कम चार हफ्तों बाद हो.

इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ कर रही है. पीठ के पांच जजों में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के अलावा चार और जज हैं, जिनमें आरएफ नरीमन, एएम खानविलकर, डीवाई चंद्रचूड़ और इंदु मल्होत्रा शामिल हैं.

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने केंद्र सरकार के सुनवाई को टालने के आग्रह को ठुकरा दिया. जस्टिस मिश्रा ने कहा कि सुनवाई टाली नहीं जाएगी. केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि इस मामले में सरकार को हलफनामा दाखिल करना है जो इस केस में महत्वपूर्ण हो सकता है.

इससे पहले, चीफ जस्‍टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को बरकरार रखने वाले अपने पहले के आदेश पर पुनर्विचार करने का निर्णय लिया था.

जस्‍टि‍स मिश्रा ने कहा था, ‘हमारे पहले के आदेश पर पुनर्विचार किए जाने की जरूरत है.’ अदालत ने यह आदेश आईआईटी के करीब 20 पूर्व और मौजूदा छात्रों, एनजीओ नाज फाउंडेशन और एलजीबीटी राइट एक्टिविस्टों की याचिकाओं पर दिया था. इन याचिकाओं में कहा गया है कि आईपीसी की धारा 377 संविधान के अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार) और अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है.

आपको बता दें कि SC ने 2013 में अपने एक आदेश में दिल्ली हाईकोर्ट के समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर करने के फैसले को पलट दिया था. दिल्ली हाई कोर्ट ने 2009 में यह फैसला दिया था.

बताते चलें कि इस समय धारा 377 के मुताबिक किसी पुरुष, महिला या जानवर के साथ ‘अप्राकृतिक’ सेक्स करने पर आजीवन कारावस, 10 साल की कैद और जुर्माना हो सकता है.

SC ने इसी साल जनवरी में अपने पुराने फैसले पर पुनर्विचार की याचिका स्वीकार की थी. इस दौरान कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि अपनी पसंद को अपनाने वाले लोगों के मन में कोई डर नहीं होना चाहिए. इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी स्वीकार किया था कि ‘हो सकता है कि जो काम किसी के लिए प्राकृतिक है वह दूसरे के लिए प्राकृतिक न हो क्योंकि सामाजिक नैतिकता समय-समय पर बदलती रहती है.

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