भारतीय रिजर्व बैंक ने मौद्रिक नीति की समीक्षा के बाद नीतिगत दरों में की बढ़ोतरी

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केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में पहली बार भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी मौद्रिक नीति की समीक्षा करते हुए नीतिगत दरों में बढ़ोतरी की है।

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में पहली बार भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी मौद्रिक नीति की समीक्षा करते हुए नीतिगत दरों में बढ़ोतरी की है। आरबीआइ की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने सर्वसम्मति से रेपो दर में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी करने का फैसला किया है। तीन दिन के विचार-विमर्श के बाद समिति के सभी सदस्यों ने एकमत से दरों में बढ़ोतरी करने का निर्णय किया। इसके साथ ही केंद्रीय बैंक ने तटस्थ रुख अपनाया है। जैसा कि बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल ने भी कहा कि बैंक इस रुख के साथ अपने लिए सभी विकल्प खुले रखना चाहता है।

क्यों बढ़ानी पड़ी ब्याज दर

परवान चढ़ती महंगाई और रुपये में लगातार दर्ज की जा रही गिरावट के बीच ऐसा लगता है कि एमपीसी के पास दरों में बढ़ोतरी के अलावा अन्य कोई विकल्प शेष नहीं था। हालांकि भारत फिलहाल सितंबर 2013 की परिस्थिति में नहीं है जब कुछ अंतरराष्ट्रीय कारणों के चलते रुपया कमजोर होता जा रहा था और विदेशी संस्थागत निवेशक बाहर निकलने के रास्ते तलाश रहे थे, लेकिन इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता है कि इन दिनों देश की अर्थव्यवस्था ऐसी ही कुछ परेशानियों से दो चार हो रही है। बीते कुछ महीनों की स्थितियों पर गौर करें तो विदेशी निवेशक डॉलर की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उभरते हुए बाजारों से लगातार निकासी का रुख अपनाए हुए हैं।

वित्तीय अस्थिरता

इसके अलावा वित्तीय अस्थिरता के संकेतों के बीच यूरोजोन में भी कमजोरी देखने को मिल रही है। आरबीआइ के आंकड़ों के मुताबिक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने 2018-19 (4 जून तक) में घरेलू पूंजी बाजार से सकल आधार पर 6.7 अरब डॉलर की निकासी की जो वैश्विक वित्तीय बाजारों में अस्थिरता को दर्शाता है। जहां एक ओर विदेशी निवेशकों की निकासी से रुपये पर दबाव बढ़ रहा है तो कच्चे तेल की बढ़ती कीमत महंगाई को हवा दे रही है। अप्रैल में हुई मौद्रिक नीति की समीक्षा से अब तक कच्चे तेल के भारतीय बास्केट की कीमत अचानक 12 फीसद उछलकर 66 डॉलर प्रति बैरल से 74 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई। तेल की कीमत में आई तेजी की वजह से जनवरी के मुकाबले रुपये में 5 फीसद तक की कमजोरी आ चुकी है।

उपभोक्ता मूल्य सूचकांक

एक अन्य प्रमुख चुनौती खाद्य महंगाई दर से संबंधित है जिसकी हिस्सेदारी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में काफी महत्वपूर्ण है, लेकिन फिलहाल इसमें कमजोरी देखने को मिल रही है। इस बात में कोई दोराय नहीं है कि अच्छे मानसून की उम्मीदों ने खाद्य उत्पादों की कीमतों पर लगाम लगने की आस जगाई है। लेकिन चुनावी वर्ष के राजनीतिक दबावों और किसानों को लेकर जारी राजनीति के मद्देनजर इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि सरकार कुछ महत्वाकांक्षी कदम उठाने के रास्तों पर विचार न कर रही हो।

न्यूनतम समर्थन मूल्य

न्यूनतम समर्थन मूल्य को उत्पादन लागत का डेढ़ गुना करने, सभी खरीफ फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रणाली को लागू करना और सभी किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य मुहैया कराने जैसे सरकार के प्रयास महंगाई दर पर दबाव बना सकते हैं। ऐसे में नीतिगत दरों में बढ़ोतरी आरबीआइ द्वारा उठाया गया दूरदर्शी कदम ही मालूम पड़ता है। नीतिगत वक्तव्य में कई और कारकों का जिक्र किया गया जो मुद्रास्फीति में इजाफे की वजह बन सकते थे। मेहनताने में इजाफा, कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी और विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा आवास किराये भत्ते का क्रियान्वयन आदि कुछ ऐसे जोखिम हैं जिनका सामना करना पड़ सकता है।

मुद्रास्फीति पूर्वानुमान

इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए ही आरबीआइ ने चालू वित्त वर्ष के लिए मुद्रास्फीति के अपने पूर्वानुमानों में संशोधन किया है। वर्ष की दूसरी छमाही जो आगामी आम चुनाव के साथ आएगी, उसके लिए मुद्रास्फीति के अनुमान को पहले के 4.4 फीसद से बढ़ाकर 4.7 फीसद कर दिया गया है। मौद्रिक नीति की समीक्षा करते हुए आरबीआइ ने इस बात पर भी गौर किया है कि घरेलू आर्थिक गतिविधि हाल की तिमाहियों में निरंतर बेहतर प्रदर्शन करती रही है। विशेष रूप से निवेश गतिविधि में लगातार सुधार देखने को मिल रहा है और दिवालियापन और शोधन अक्षमता संहिता के तहत अर्थव्यवस्था के परेशानीग्रस्त क्षेत्रों के त्वरित समाधान से और आगे बढ़ सकती है।

विपरीत परिस्थितियां

भू-राजनीतिक जोखिम, वैश्विक वित्तीय बाजार अस्थिरता और व्यापार संरक्षणवाद का खतरा घरेलू वसूली के लिए विपरीत परिस्थितियां उत्पन्न करता है। ऐसे में इस बात पर गौर करना काफी अहम है कि सार्वजनिक वित्त निजी क्षेत्र की निवेश गतिविधि कमजोर न कर दें। केंद्र और राज्यों द्वारा बजटीय लक्ष्यों का पालन करने से मुद्रास्फीति परिदृश्य के लिए नई चुनौतियां पैदा हो सकती हैं। इसके साथ ही निर्यात में महज 3 फीसद की दर से हो रही वृद्धि और आयात की वृद्धि दर के दहाई अंकों में पहुंच जाने के मद्देनजर आरबीआइ के लिए देश के बाहरी खाते के प्रति भरोसा बहाल करने के लिहाज से उचित कदम उठाने जरूरी थे।

दरों में बढ़ोतरी का असर

आम तौर पर आरबीआइ द्वारा नीतिगत दरों में बढ़ोतरी को ब्याज दरों में बढ़ोतरी से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि वास्तविकता कुछ और ही है। विशेषज्ञों की मानें तो दरों में हुई 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी से गृह ऋण पर कुछ खास असर पड़ता नहीं दिखता है। इन दिनों गृह ऋण लेने वाले ज्यादातर लोग फ्लोटिंग दरों का ही विकल्प चुनते हैं। ऐसे में तात्कालिक तौर पर खरीदारों की मनोभावना पर दरों में हुई वृद्धि का असर भले ही पड़े, लेकिन रियल एस्टेट क्षेत्र पर इसका कुछ खास असर पड़ता नहीं दिखता है। वैसे भी प्रधानमंत्री आवास योजना, रेरा जैसे कुछ अहम प्रयासों के माध्यम से केंद्र सरकार लगातार रियल एस्टेट क्षेत्र को गति देने की कोशिश पूरे मनोयोग से कर रही है।

ब्याज दरों में बढ़ोतरी लाजिमी

हालांकि आरबीआइ की घोषणा के बाद बैंकों द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी करना लाजिमी है, लेकिन आरबीआइ ने प्राइयॉरिटी सेक्टर लेंडिंग के स्लैब में बढ़ोतरी कर ऋण लेने वालों का खयाल रखने की पूरी कोशिश की है जिससे छोटे ऋणों के सस्ते होने की उम्मीद है। 10 लाख से इससे अधिक आबादी वाले शहरों में घर के लिए लिया गया 35 लाख रुपये तक का ऋण अब प्राइयॉरिटी सेक्टर लेंडिंग के दायरे में आएगा जिसके लिए अब तक 28 लाख रुपये तक की सीमा तय थी। इसके अलाव अन्य शहरों के लिए पहले 20 लाख रुपये के मुकाबले अब 25 लाख रुपये तक का ऋण इसके लिए स्वीकार्य होगा। हालांकि इसके लिए 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहर में घर की कीमत 45 लाख रुपये और अन्य शहरों में 30 लाख रुपये से अधिक नहीं होनी चाहिए।

बढ़ोतरी का स्वागत

बैंक खुले दिल से आरबीआइ द्वारा दरों में बढ़ोतरी का स्वागत कर रहे हैं। ज्यादातर बैंकों का मानना है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के इस दौर में महंगाई के निपटने की दिशा में कदम बढ़ाते हुए आरबीआइ ने केंद्रीय बैंक के तौर पर अपनी विश्वसनीयता को पुख्ता किया है। उनका कहना है कि घरेलू और वैश्विक अर्थव्यवस्था में संभावित बदलावों को ध्यान में रखकर ही आरबीआइ ने अपना रुख तय किया है जिससे वित्तीय स्थिरता को मजबूती मिलेगी। इसके अलावा सरकार ने भी आरबीआइ द्वारा नीतिगत दरों में की गई बढ़ोतरी को संतुलित कदम करार दिया है। मौजूदा परिस्थितियों और तेल की कीमतों की गति को देखते हुए दरों में बढ़ोतरी को सरकार ने न्यायोचित ठहराया है। सरकार का मानना है कि इस प्रयास से अनिश्चितताओं और बाजार के फेरबदल से निपटने में मदद मिलेगी।

उद्योग जगत की निराशा

हालांकि उद्योग जगत ने जरूर कुछ हद तक निराशा प्रकट की। उद्योग के जानकारों का तर्क है कि नोटबंदी की वजह से बाजार में नकदी की कमी और उसके बाद जीएसटी जैसे नए कानून से तालमेल बिठाने की पुरजोर कवायद के बाद अब जाकर बाजारों में रौनक लौट रही थी, वृद्धि दर ने रफ्तार पकड़नी शुरू ही की थी कि आरबीआइ ने दरों में बढ़ोतरी कर निवेश को लेकर बढ़ रही उम्मीदों पर एक बार पानी फेर दिया है। इसके अलावा कुछ उद्योगपतियों का मानना है कि आरबीआइ ने इस कदम से उद्योग को निवेश निर्णयों पर आगे बढ़ने के संकेत दिए हैं। 1कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि आरबीआइ ने एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की है। महंगाई दर को 4 फीसद की जद में लाने की कोशिश करते हुए आरबीआइ ने वृद्धि दर और राजकोषीय सुदृढ़ीकरण की ओर भी कदम बढ़ाने के प्रयास किए हैं।

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