ब्रिक्‍स सम्मेलन में भारत उठाएगा सीमा पार से आतंकवाद का मुद्दा, ड्रैगन पर होगी नजर

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दक्षिण अफ्रीका के जोहानिसबर्ग में होने वाले ब्रिक्‍स सम्मेलन में सीमा पार से किया जा रहा आतंकवाद भारत का मुख्य एजेंडा हो सकता है।

केंद्रीय उद्योग एवं वाणिज्य राज्यमंत्री सीआर चौधरी आज दक्षिण अफ्रीका रवाना होंगे। चौधरी 4 व 5 जुलाई को आयोजित दो दिवसीय ब्रिक्स सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे। दक्षिण अफ्रीका के जोहानिसबर्ग में होने वाले ब्रिक्‍स सम्मेलन में सीमा पार से किया जा रहा आतंकवाद भारत का मुख्य एजेंडा हो सकता है।

इस सम्मेलन में ब्रिक्स संगठन के सदस्य देश ब्राजील, रूस, भारत, चीन व साउथ अफ्रीका के व्यापार व उद्योग मंत्री भाग लेंगे। ब्रिक्स व्यापार मंत्रियों के सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य भविष्य में उद्योगों के विकास के फलस्वरूप रोजगार सृजन की संभावनाओं के बारे में विचार करना रहेगा। चौथी ओद्योगिक क्रांति के तहत तकनीकी रूप से युवाओं को सक्षम बनाना और भविष्य में बेरोजगारी की समस्या के समाधान के लिए नवीन रोजगार स्त्रोतों की खोज व पहचान करना है। ब्रिक्स देशों के इस मंत्रियों के सम्मेलन में व्यापार, वाणिज्य, उद्योगों की स्थापना आदि मुद्दों पर चर्चा करेंगे।

पिछले सप्‍ताह राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की डरबन यात्रा के बाद यह कयास लगाए जा रहे हैं कि ब्रिक्‍स सम्‍मेलन में आतंकवाद प्रमुख एजेंडा होगा। डोभाल ने डरबन में मजबूती से भारत का पक्ष रखते हुए कहा था कि सीमा पार से प्रायोजित आतंकवाद को रोकने के लिए आवश्यक प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। उन्‍होंने अन्य ब्रिक्स देशों के राष्ट्रीय सलाहकारों के साथ की गई बैठक में कहा कि यह पता लगाने का रास्ता तलाशा जाना चाहिए कि आखिर आतंकवाद की नर्सरी चला रहे देशों ने अपनी धरती से उनके खात्मे के प्रयास किए हैं या नहीं।

पिछले वर्ष हुए ब्रिक्‍स सम्मेलन में भारत की बड़ी कामयाबी यह थी कि उसके घोषणापत्र में आतंक के लिए पाकिस्तान स्थित आतंकवादी समूहों लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद का नाम लिया गया था। यह सब रूस की मदद से हो पाया था। 2016 में गोवा में हुए सम्मेलन में चीन के विरोध के बाद इन समूहों का नाम नहीं लिया जा सका था। भारत ने इस साल ब्रिक्स की तैयारी बैठकों में भी घोषणापत्र में लश्कर और जैश का नाम लिए जाने पर जोर दिया है।

हालांकि, जियामेन घोषणापत्र जल्द ही दिसंबर 2017 में आरआईसी (रूस, भारत, चीन) की संयुक्त समिति द्वारा उलट दिया गया। इसमें इन्हीं समूहों के नाम का जिक्र नहीं था। हालांकि, इसमें अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद और आतंकवादी संगठनों के खिलाफ निर्णायात्मक कदम उठाने की बात कही गई थी।

क्‍या है ब्रिक्स

ब्रिक्स की स्थापना की पहल 2006 में चार देशों- ब्राज़ील, रूस, भारत तथा चीन द्वारा की गई थी। इन्ही देशों के नाम के पहले अक्षरों के आधार पर इसका BRIC (ब्रिक) नाम रखा गया। बाद में 2010 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल हो जाने के बाद इसका वर्तमान नाम BRICS (ब्रिक्स) हो गया। BRICS  अर्थात ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका विश्व के ऐसे पांच देशो का संगठन है, जिन्हें विश्व की उभरती हुई आर्थिक शक्तियां की संज्ञा दी जाती है। ब्रिक्स  देशो का पहला शिखर सम्मलेन 2009 में आयोजित किया गया था, लेकिन  इसकी शुरुआत 2006 में हुई थी।

अहम रही जिम ओ नील की भूमिका

ब्रिक्स का विचार सबसे पहले वित्तीय सलाहकार कंपनी गोल्डमेन सैक के अर्थशास्त्री जिम ओ नील ने 2003 में दिया था। जिम ओ नील ने ब्रिक का विचार 2003 में प्रकाशित अपनी report “Dreaming with BRICS: The path to 2050” में दिया था। उनके अनुसार चार देशो- ब्राजील, रूस, भारत और चीन की विकास क्षमता इतनी अधिक है कि 2050 तक ये देश विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं होगे। वर्तमान में अमेरिका तथा यूरोपियन संघ की अर्थव्यवस्थाएं विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं है। इस रिपोर्ट के अनुसार चीन तथा भारत वस्तुओं तथा सेवाओं के उत्पादन में विश्व के सबसे बड़े निर्माताओं के रूप में उभर रहे है। वहीं दूसरी ओर रूस व ब्राज़ील विश्व के कच्चे माल के सबसे बड़े आपूर्तिकर्ता के रूप में उभर रहे है।

ब्रिक्स के पांच सदस्य देशों की कुल जनसँख्या 3.6 बिलियन है, जो विश्व की कुल जनसँख्या का 40 फीसद है। इसी प्रकार इन पांच देशों का घरेलू उत्पाद 16.6 ट्रिलियन डॉलर है, जो विश्व के सकल घरेलू उत्पाद का 22 फीसद है। इन आंकड़ों के आधार पर ब्रिक्स देशों की अर्थव्यवस्था व विश्व में उसके महत्व का अनुमान लगाया जा सकता है।

जारी घोषणा पत्र ही है एजेंडा

ब्रिक्स का अपना कोई संविधान नही है, लेकिन इसके सम्मेलनों के अंत में जारी घोषणा पत्रों के आधार पर इसके निम्नलिखित उद्देश्य माने जा सकते है। विभिन्न क्षेत्रों में सदस्य देशों के बीच पारस्परिक लाभकारी सहयोग को आगे बढाना, जिससे इन देशों में विकास को गति प्रदान की जा सके। एक न्यायपूर्ण तथा समतापूर्ण विश्व व्यवस्था की स्थापना जो किसी एक समूह के प्रभुत्व में न होकर बहुपक्षीय प्रकृति की हो। इसका मन्तव्य पश्चिमी प्रभुत्व वाले वैश्विक व्यवस्था के स्थान पर एक नई बहुपक्षीय व्यवस्था की स्थापना करना है।

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